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दहेज प्रथा

 आज की पोस्ट का शीर्षक है। दहेज प्रथा। लड़की और लड़के के जन्म से ही एक शब्द को जन्म मिल जाता हैं और वो शब्द हैं दहेज।  सदियों से इस दहेज शब्द ने कितने ही तांडव किये हैं और कही शांति के साथ परिवारों को संबल दिया।  जीवन की यात्रा में जब बच्चे बड़े होते हैं तो विरासत में मिली रीति और रिवाजो की धरोहर के मुताबिक यौवन में कदम रखती संतानों को वैवाहिक संबंधों में बांधने और संसार मे ग्रहस्थ जीवन को संबल देने के लिए विवाहो को संपादित किया जाता हैं।  सदियों से इस वैवाहिक परम्परा में दहेज अर्थात पिता अपनी पुत्री को जोकि जीवन के नए वैवाहिक क्षेत्र में कदम रखने जाती हैं तब पिता के घर से पुत्री के घर ससुराल के लिए कुछ आवश्यक वस्तुओं व नीतियों का संग्रह दिया जाता था जोकि उस समय के मुताबिक धातुओं में ही होता था।  जैसे उस समय सोना,चांदी,पीतल,तांबा, कांसा, और मिट्टी व लकड़ी के साथ साथ कपड़े आदि सहयोग वस्तुओं को देने की परंपरा थी।  इस परंपरा का कारण था कि पिता अपनी पुत्री को अपनी हैसियत के मुताबिक कुछ सहयोग और वो भी आवश्यक सामग्री और वस्तुएँ।  जीवन का सार और समय बदला। धातुओं क...

अकेलापन

अकेला शब्द शायद आप ने हजारों बार सुना होगा। लेकिन कभी गौर किया कि अकेला शब्द में ऐसी कौनसी तासीर हैं जो बड़ा अटपटा और बेहद डरावना शब्द लगता हैं। अकेला यानी किसी का साथ नही,अकेला मतलब कोई साथ नही,अकेला मतलब सृष्टि में बिल्कुल अकेला और निरीह नितान्त अकेला। दुनिया मे जो व्यक्ति बिल्कुल अकेला होता हैं,अकेला पड़ जाता हैं। अकेला हो जाता हैं। तो समझो संसार उसको सबसे नीच,असफल,बेइज्जत व कम बुद्धि वाला काम मानते हैं। लेकिन संसार शायद भूल कर रहे हैं कि अक्सर अकेला शब्द वो शब्द हैं जो संसार को सार देता हैं। संसार मे शायद ही कोई हुआ हैं जो अकेलेपन से नही गुजरा हो। या जिसने अकेलेपन को नही जिया हो। लेकिन जिस अकेलेपन को लोग बुरा कह रहे है। अक्सर यह वो लोग कहते है जो मन और विचारों से इतने कमजोर होते हैं। जिनकी बुद्धि निम्न व इतनी कमजोर होती हैं जो बिना साथ के बिना पार्टी या माफिल के या बिना झुंड के नही रह सकते। यानी ऐसे लोग साधारण सोच और साधारण विषय की परिभाषा को इंगित करते हैं। अक्सर जिनका दिल,मन और विचार कुंठित होते है उनको अकेलापन एक जेल लगता हैं। उनको अकेलापन काटने को दौड़ता हैं। उनको अकेलापन खटक...

आजका युवा और युग

  दोस्तों यह लेख मैं एक स्टडी और काफी रिसर्च के बाद लिख रहा हूँ।  विदेश की एक मैगज़ीन और वेबसाइट व संगठन ने एक स्टडी की जिसमे पाया कि पहले आर्थिक सक्षमता नही थी। ज्यादतर आबादी गरीब थी। लेकिन वर्धश्रम नही थे। बुजुर्गो की अवहेलना नही होती थी। युवा या पिछली पीढ़ी बुजुर्गो का सन्मान करती थी। जबकि आज आर्थिक सक्षमता ज्यादा हैं धरती की बड़ी आबादी आज रोजगार और धन से शारोबार हैं। हर प्रकार की सम्पनता हैं। धन और लाइफ स्टाइल भी अत्यधिक परिपक्व हैं।  नारी पढ़ लिख गयी। बच्चो को बड़े और उम्दा स्कूलों और कॉलेजो में शिक्षा भी दी। कच्चे घरो से आज ऊंचे और बड़े व लग्जरी व गाड़ी घोड़े व तमाम तरह की सुविधाएं मिल गयी लेकिन क्या आज का युग व आज के हम लोग पहले की तुलना में सुखी हैं।  क्या नारी के  शिक्षित होने और पर्दा प्रथा खत्म होने व नर के बराबर हक्क और आजादी से दुनिया सुखी हैं।  क्या बच्चो को माता पिता अपना निवाला मुँह से निकाल कर बड़े और महंगे स्कूलों और कॉलेजो में शिक्षा और अपने सपनो की कुर्बानी देकर आज बेटे बेटियों का आराम माता पिता को मिल रहा हैं।  क्या पति दिन रात मेहनत और हाल...