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मन,इच्छा और भोग

 आज की पोस्ट का विषय हैं मन पर नियन्त्रण। यानी जीवन का सबसे अहम विषय हैं। "मन" यानी हमारे शरीर का वो आयाम जिसके कारण दुनिया और जहन से लेकर जहांन तक इससे अछूता नही हैं। 

जीवन मे मन ही वो आयाम हैं जिसके कारण इंसान पाप से पुण्य के बीच बहता हैं। मन ही वो कड़ी है जो संसार को गति और मति दे रहा हैं।
किसी महापुरुष ने कहा हैं कि दुनिया का सबसे तेज अगर कोई आयाम है तो वो मन हैं। 
मन एक पल में करोड़ो किलोमीटर की यात्रा करके दूसरे पल वापस लौट आता हैं।
किसी कवि ने कहा हैं कि 
मन के मते न चलिए,मन पल पल है और
,कभी चंचल, कभी मन राजा, कभी मन फ़क़ीर,
एक पल में लाख चले,न चले कमजोर,
मन सोचे तो बने राजा,मन सोचे तो चोर,
मन के सोचे जो चले तो समझो उसका मन ही बने पक्ष कमज़ोर।
जीवन मे मन एक धोखा हैं,जीवन मे मन एक बुलबुला,
जीवन मे मन जंजाल हैं। मन ही है सब दुखो की खान।
मन तो सदा बावरा,उड़ता फिरे अटारी,
मन जिसके काबू रहे वही जीते नगरी सारी।
मन का जो गुलाम हैं,मन उसको ले डूबे,
मन तो छपन भोग खाये दोपहरी में सपने दिखाये।
मन बिना कर्म के फल चाहे,मन तो बिन पढ़े अंक चाहे।
मन तो सोते हुए व व्यायाम चाहे। मन तो बिन युद्ध राजा बनना चाहे।
मन कर्म का चोर है। मन है धोखेबाज,
मन की जो अगर सुने, वो रहजावे मजधार।
जीवन मरण मन से चले,मन के मते जो चले,
उसका कोई न पार पाये।
जीवन एक संग्राम हैं मन है एक छलावा।
जीवन संघर्ष में मन ही है दुश्मन हमारा।
मूसा(चूहा)मन एक से,दोनों चित चंचल,
मन को जो जीत ले,जैसे करे गजानन चूहे सवारी।
मन ही सब संसार मे है लफड़ों की जड़।
आज नही तो कल बन्दे करना होगा इसको बंद।
मन के लिए नही है सागर अर दीवार।
मन चले ऐसे घोड़े जिसका कोई नही शानी।
मन के घोड़े लगाम नही,न है जिसके पागड़े।
मन ही है हंसा का दुश्मन,न करने दे काम।
रात दिन मन सुख ढूंढे बिना कर्म के फल।
मन जो आलसी मन है लापरवाह।
मन ही आज मलिन है। मन ही आज कुलीन।
मन की जो माने,न करे कर्म हर रोज,
मन उसका इस संसार मे ऐसा करे पतन।
घोड़ा बनना है तो मन को करो परे।
सिंह बन करो गर्जना तो मन को करो दफन।
जिसका मन दफन है वो करता है राज,
संसार जिसके इसारे चले,जो दबा दे अपना मन।

यानी आपने जो ऊपर लिखी कविता के सार को यदि समझ गए तो समझो आपका जीवन संसार मे फतह की तरफ बढ़ जायेगा।
मन ही इस संसार मे सभी दुखो की जड़ हैं। बिना पढ़े अंक चाहता हैं। बिना व्यायाम के तन और बिना कर्म के धन चाहे अर बीन बोए धान।
बिना चले चाहे सौ कोस चलना और बिन युद्ध लड़े राज,
यानी मन तो  बिना कुछ किये सिर्फ खटिया पर पड़े पड़े ही सबकुछ पाना चाहता है। मन तो बिना माँ बने आज ममता मांगे।  बिन रात के दिन। सुख चाहे संसार के लागे न दमड़ी अंग। 
मन तो ये भी लेलु, मन कहे ये भी खा लू,मन कहे कि ये भी पा लू,मन कहे कि दुनिया मे राज हो भले संभले नही तन के कपड़े। मन कहे कि मैं चढू घोड़े भले सँभले नही लगाम।

मन चंगा तो कठौती में गंगा। 
यह कहावत तो आपने सुनी ही होगी। इस दुनिया मे जितने भी पाप और पुण्य के कर्म हो रहे हैं सबका आधार मन है। बड़े से बड़े अपराध का एक ही कारण है कि मन मे पनपे प्यार या गुस्सा।
जिस इंसान को बचपन से जैसा माहौल मिला वैसा मन। जिसको बचपन से गुस्सा और तिरिस्कार मिला उसका मन उसी दिशा में आगे बढ़ेगा।
मैं स्वंय  यह मानता हूँ कि आज दुनिया मे जितने भी अपराध हो रहे है या जितने भी क्रुर कर्म हो रहे हैं उनका कारण हैं मन और मन के पीछे है जीवन को जीने के लिए कर्म करने के उद्देश्य और व्यवहार करने के उद्देश्य। 
जब बच्चा बचपन मे जैसे जैसे बड़ा होता हैं उसको 100% देखरेख और प्यार और इजज्जत और सन्मान व जरूरत की सुविधाएं देते रहो फिर देखो की कैसे वही बच्चा बड़ा बनकर कैसे इस संसार मे बेहतर और शांत और मजबूत मन से दुनिया में अपना जीवन चलाता हैं।
मन के पीछे के सच्च को जानने के लिए आप सदैव अपने गए हुए समय की छाप और मनन को शांति से एक जगह पर बैठ कर सोचे।
मन के कारण बड़े से बड़े अपराध आज संसार मे हो रहे हैं। कारण अवसादित मन के। कुंठित मन के,बचपन के अनकहे पहलुओ के।
आज यदि को अपराधी है। आवारा है या सड़क के किनारे चलने वाला कोई पागल। या कोई गमगीन अंधेरो में बैठा शायर या युद्ध हारने वाला सिपाही,या बच्चे को जन्म देने वाली माँ या पालतू जानवर या संसार का वो हर आयाम जो सजीव है मन से चल रहा हैं। मन मे उच्च विचार और सार है तो यही संसार स्वर्ग हैं घर अगर सम्पूर्ण सुविधाओ से भरा है लेकिन मन मे शांति नही तो समझो सब संसार जूठा,दुश्मन या अपराधी। 
मन को जैसे सींचोगे वैसे ही बन जाओगे। मन की गंठरी में ही संसार का सार है। 
मैं काफी लंबे समय से "मन" पर खोज में लगा हुआ हूँ। मन के वास्तविक आयाम को हम जिस दिन समझ गए समझो सम्पूर्ण दुनिया एक शांत आयाम में चलना शुरू हो जाएगा।

आज संसार क्यो सही दिशा में नही चल रहा हैं। क्योकि आज संसार के 95% लोगो का मन ही विचलित हैं। जब मन ही विचलित हैं कुंठित है तो समझो संसार मे शांति कैसे रहेगी।
मानलो A का मन पारिवारिक रूप में बचपन से कुंठित था। जिसके विषय शायद अलग अलग हो सकते हैं। जिसमे गरीबी, लाचारी,हक्क से लेकर असंख्य विषयो की कतार हो सकती हैं के कारण जब वही A बड़ा होता हैं तो A को जीवन मे जिस विषय वस्तु की कमी हैं वही दिशा में अपना जीवन मौड़ देगा वैसी ही संगत और पंगत के साथ अपने साथ रहने वालों के दिमाग और मन मे वैसे विचारो के बीज बोयेगा। 
जब एक ही प्रकार के बचपन के लड़के एक साथ बड़े होकर गली मोहल्ले में मिलते हैं तो फिर उनके बनने वाले ग्रुप और संगठन वैसे ही कर्मो को अंजाम देते हैं।
यानी किसी भी उचित और अनुचित कर्म के पीछे जन्म से लेकर उस समय तक के मन और मन मे दबे और पनपे और मन को दूसरो से मिली संगत की खुराक के असर के ही निशान है कि कोई शांति से जिंदगी जो रहा है कोई नफरत और अपराध की दुनिया में जी रहा है।
मन के इतिहास के कारण ही तो कोई संत और कोई डॉक्टर और कोई अपराध के रास्तो पर चल रहा हैं। जैसे मन वैसे तन। जैसा मन वैसा कर्म। जैसा मन वैसी संगत। जैसा मन वैसी पंगत। जैसा मन वैसा कल। जैसा मन वैसा फल। जैसा मन वैसा जीवन। जैसा मन वैसा संसार। जैसा संसार के लोगो का मन वैसे संसार मे लोगो के जीवन का आधार। यदि अपराध और जुल्म या किसी विशेष गिराव की तरफ बढ़ रहा हैं तो समझो संसार का 80% मानव अपने मन और मस्तिष्क के निर्णयों में खो गया हैं भले विचार सही हो या गलत।
सदियो से मन सदा भोग के पीछे ही भागता रहा हैं। मन और भोग का गहरा नाता है। भोग जोकि इस संसार मे सदैव कभी खत्म न होने वाली इच्छा को जन्म दे चुका हैं। भोग की बेटी हैं इच्छा जोकि सदा मन से मिली हुई रहती हैं।
यानी यह कहना कोई अतिशियोक्ति नही होगी कि मन भोग की इच्छा के पीछे अंधा हो गया हैं। जिस दिन जब मन इच्छा के संपर्क में आ गया तो समझो वैसे ऑटो टाइमिंग दोनों के बीच सेट हो चुकी है कि जिसका कोई अंत नही।
मन अक्सर बाजार में जब जब निकलता हैं या इच्छा के संपर्क में आता है समझो इच्छा बलवती हो जाती हैं। 
मन और इच्छा के कारण आज समाज संस्कारो और सत्य व रिस्तो और फर्ज से या अनकहे पहलुओ से मुड़ कर सिर्फ और सिर्फ अपने भोग की संतुष्टि में लग चुका है। जो कि संसार मे पतन और विनाश का कारण हैं। 
मन के इसी लेख के आगे यदि आप पढ़ना चाहते हैं तो कमेंट में अपना विषय लिखे। 

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