पाप क्या हैं पुण्य क्या हैं।
मानलो दुनिया एक रेस्टूरेंट हैं। जहाँ खाना पहले बनाना पड़ता हैं सर्व करने के लिए। बाद में मिलता हैं खाने के लिए।
पाप क्रेडिट कार्ड हैं जहाँ पहले उधार पर रेस्टूरेंट से जितना मर्जी हैं खा लो। जितना मर्जी है खरीद लो। लेकिन बाद में अदा यानी बिल तो चुकाना पड़ता हैं। अब यदि पास में पैसे नही हैं तो सामने वाले के मुताबिक कोई भी कार्य किया जाना तय हैं। क्योंकि बिल तो अदा करना ही हैं।
ठीक वैसे ही पुण्य उस डेबिट कार्ड की तरह हैं जिसमे किसी भी सेवा से पहले धन चुका दिया जाता हैं। यानी रेस्टूरेंट में पहले ऑर्डर्स का पेमेंट किया और फिर आराम से घर बैठे खाया।
जीवन में जो भी हैं कर्ज और अदा करने का तरीका हैं भले बिल हो या कर्म।
इसी प्रकार ऐसे कर्म जिनके अनुसार सिर्फ बेहतर कार्यो को व मानवकल्याण के कार्यो को अंजाम दिया जाता है। ठीक वैसे ही जैसे संसार के रीति और नीति के लिए आवश्यक है।
जब संसार मे उत्तम कर्म किये जाते हैं तो लौट कर आपके पास कई गुना आते हैं। जिसको पुण्य कहते हैं। आपके अच्छे कर्मों के कारण आपके सांसारिक कार्यो में रिस्ते नातो का व यार दोस्तो का साथ मिलता है। लोग आपके साथ खड़े रहते हैं। आपके प्रत्येक कार्य व परिणाम को सेलिब्रेट करने में आपके साथ आते हैं।
जबकि बुरे कर्म सिर्फ और आपके स्वार्थ के कारण अपने लिए जिसमे आपके सुखों का ही केंद्र में होना व समय व हर क्षण आप अपने सुखों के लिए लोगो को धोखा और हानि और विचारो से मानसिक वेदना देते हैं। आप हर कदम पर किसी से छलावा और कदम कदम पर षड्यंत्र छिपाव,बनावटी व्यवहार और अनगिनत पायदानों पर दिखावा ही आपका मुख्य आधार बन जाता हैं तो समझो आपका सबकुछ एक ही कर्म के अनुरूप आकर खड़ा हो जाता हैं और वो है पाप कर्म।
लेकिन पाप कर्म में यदि आप जानबूझ कर किसी के साथ षड्यंत्र या सोच समझ कर कोई धोखा नही दे रहे हैं तबतक बुरा फल नही मिलेगा। जिस दिन आपने बुरे इरादों से कर्म करना शुरू कर दिया। दूसरो को तकलीफ देकर आप सुखी होने की तरफ जिस दिन सोचने लगोगे समझो आप का समय पाप कर्म से जुड़ गया हैं। जोकि आपको आने वाले समय मे एक दिन सबकी नजर में गिरा देगा यही पाप कर्म है।
जिस दिन आपको समाज मे इजज्जत मिलना शुरू आपके पुण्य कर्म और जिस दिन आपको समाज मे बेइज्जती मिलने लगे समझो पाप कर्म यही सूत्र हैं पाप और पुण्य कर्म का पता लगाने के लिए।
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