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दहेज प्रथा

 आज की पोस्ट का शीर्षक है। दहेज प्रथा।

लड़की और लड़के के जन्म से ही एक शब्द को जन्म मिल जाता हैं और वो शब्द हैं दहेज। 
सदियों से इस दहेज शब्द ने कितने ही तांडव किये हैं और कही शांति के साथ परिवारों को संबल दिया। 
जीवन की यात्रा में जब बच्चे बड़े होते हैं तो विरासत में मिली रीति और रिवाजो की धरोहर के मुताबिक यौवन में कदम रखती संतानों को वैवाहिक संबंधों में बांधने और संसार मे ग्रहस्थ जीवन को संबल देने के लिए विवाहो को संपादित किया जाता हैं। 
सदियों से इस वैवाहिक परम्परा में दहेज अर्थात पिता अपनी पुत्री को जोकि जीवन के नए वैवाहिक क्षेत्र में कदम रखने जाती हैं तब पिता के घर से पुत्री के घर ससुराल के लिए कुछ आवश्यक वस्तुओं व नीतियों का संग्रह दिया जाता था जोकि उस समय के मुताबिक धातुओं में ही होता था। 
जैसे उस समय सोना,चांदी,पीतल,तांबा, कांसा, और मिट्टी व लकड़ी के साथ साथ कपड़े आदि सहयोग वस्तुओं को देने की परंपरा थी। 
इस परंपरा का कारण था कि पिता अपनी पुत्री को अपनी हैसियत के मुताबिक कुछ सहयोग और वो भी आवश्यक सामग्री और वस्तुएँ। 
जीवन का सार और समय बदला। धातुओं की जगह अब स्टील,अलमुनियम,तरह तरह के कपड़े और अन्य घरेलू सामग्री के साथ साथ सोने चांदी से लेकर पीतल तांबा की मात्रा तो कम पड़ गयी और आज इस जगह पर मशीनों से बने समान और अन्य सामग्री को मुख्य तव्वजो मिल गयी।
आज दहेज लड़के वालों का हक्क हो गया। आज लड़के वाले अकड़ के साथ उस रिवाज को अपना हक्क मानते है जिसको लड़की का पक्ष अपनी मर्जी और हैसियत से दहेज देता था। और लड़का पक्ष उस समय लड़की के पिता के द्वारा दिया गया गया खुशी का उपहार जिसको आज दहेज कहते हैं स्वीकार करता था। वो भी बिना किसी अकड़ और फरमाईस के।
लड़के के पक्ष से एक ही आवाज आती थी इसकी क्या जरूरत थी। पहले ही आपने हमे आपका सबसे कीमती नगीना बेटी अर्थात कन्या का दान कर दिया। 
तब लड़की के पिता के मुंह से एक ही आवाज आती थी कि यह तो आपका बड़पन हैं जो मुझे आप जैसे समधी मिले। यह तो मेरी बिटिया को उपहार के तौर पर कुछ दे रहा हूँ बाकी तो आज से आप भी उसके दो और  माता पिता मिल गए। अर्थात आज से मेरी बेटी के 4 माता पिता हो गए अब मेरी बिटिया को जीवन के किसी भी क्षेत्र में डरने और भय की कोई आवश्यकता नहीं।
यानी वो भी एक समय था जब शादी के बाद लड़के और लड़की को दहेज के रूप में उपहार और 4 माता पिता मिलते थे। यानी दोनो पक्षो को मानो एक दूसरे का आसरा और सहारा मिल गया।
पहले के समय शादियां सिर्फ दिखावा या घमंड नही थी बल्कि शादियां दो मनो के साथ साथ दो तानों, दो आत्माओं से लेकर दो परिवारो के मिलन के साथ साथ प्रकृति के विकास यात्रा को कायम रखते हुए इस संसार में जीवन निर्वाह का एक प्रारूप और उम्दा विचार व कार्य था जो आज कितना बदल गया हैं।
पहले के समय बेटी को दहेज में पाप कर्म से कमाए धन से विवाह और दहेज का सामान या खान पान से लेकर कुछ प्योर शुद्ध धन के द्वारा शादी कार्य किया जाता था। किसी कारण से पाप संज्ञय कुछ धन यदि बेटी के बाप के पास आता था तो उसका इस्तेमाल पिता आपने लिए कर लेता था लेकिन बेटी को पाप के धन द्वारा एक पैसा भी उपयोग नही करता था। कारण था कि कही बेटी के परिवार और बेटी के वैवाहिक संसार मे कही कुछ अनहोनी न हो जाये।
साथ ही दहेज व लेनदेन का कोई दबाव नही था। न ही कोई दिखावा था। न ही अकड़ थी न ही भटकाव था। न ही दहेज न मिलने की आशा से दरकते रिस्ते और नाते थे। न ही दहेज के कारण जलती बेटिया और बेटियों के परिवार थे।
न ही दहेज के कारण पिता का झुकता हुआ सिर था। न ही दहेज के लिए अंतर्मन तक टूटा पिता का सपना था। न ही माता के आंचल पर बिटिया बोझ थी। न ही भाई की बहिना परिवार पर बोझ थी। न ही बेटी किसी परिवार की मजबूरी थी। न ही बेटियों के लिए झुकते सिर थे। 
लेकिन आज सबकुछ बदल चुका हैं। आज बेटियों का जलता सपना और संसार में दहेज नामक उपहार ने आज दबाव और मजबूती से लड़की के परिवार को लील लिया हैं। आज 21 सदी में जहाँ शिक्षा और विकास अपने चरम पर है। आज लड़कियों को पढ़ाने में माता पिता अपना सर्वस्व न्योछावर करते हैं। जब लड़की की उम्र शादी के लायक हो जाती हैं तो  लड़के वाला परिवार डिमांड अर्थात मांग रखता हैं कि इतना तो पहले से बोल दिया था हमने ही मना कर दिया। लंबी लिस्ट लड़की के पिता को पकड़ाते हैं कि इतना होगा तो ही बात आगे बढ़ेगी नही तो अभी कोई देरी नही हुई हैं और आ जाएंगे।
यानी अब समय बदल गया हैं दहेज प्रोफेशनल डिग्री लेकर इतना बड़ा और हैसियत वाला बन चुका हैं कि उसके डाब दबे से बिटिया और उनका परिवार आज भी सकते में हैं। जोकि वास्तविक नीतियों से कोसो दूर हैं। 
जीवन का वास्तविक मतलब तो सिर्फ सीधा हैं। कि अपने दुख को देखते हुए संसार मे कुछ बेहतर करते हुए रुक्सत होना। कुछ भी स्थाई नही। फिर इस दहेज रूपी दानव से इतना लगाव क्यो।
जबकि इतनी तव्वजो हो सकती हैं कि खानदान में लड़की गुणी और संस्कारों वाली आये। जोकि हर लड़के वालों का हक्क हैं और हर लड़की वालो की जिम्मेवारी हैं। 

एक कहावत सच्च हैं कि लोहा लोहे को काटता हैं। दहेज के पीछे भी नारी ही हैं जो सास हो सकती हैं दादी,नानी चाची,मामी या बहन बेटी या बुआ हो सकती हैं।
जब जब घरो में रिस्ते होते हैं वहाँ नारी शक्ति ही आने वाली नारी को स्वीकार करने की एवज में दहेज़ की मांग करती हैं।
यह सतप्रतिशत सच्च हैं की बेटे या लड़कियों के ससुर कभी दहेज के लिए लालच नही करते। कुछ अपवाद हो सकते हैं लेकिन बहुत बड़ा धड़ा आदमियों का कभी दहेज की डिमाण्ड नही करता। जबकि औरत अर्थात नारी बिरादरी दहेज को ही शादी का मुख्य केंद्र मानती हैं लड़के के लिए लड़की तो मात्र एक फॉरमैलिटी हैं। अगर मजबूत दहेज मिल रहा हैं तो गुणी और संस्कारवान बहु की भी जरूरत नहीं कैसी भी लड़की चलेगी। 
अतः नारी ही नारी को काट रही हैं नारी ही नारी के अपमान का मुख्य केंद्र और आरी बनकर खड़ी हैं। जबकि वो सासु बनी नारी यह क्यो नही सोचती की कभी वो भी बहु थी अर्थात मशहूर टीवी धरावाहिक की लाइन है। "सास भी कभी बहु थी" अर्थात आज की हर सासु बीते कल की बहू थी। और जो आयी थी ससुराल तब वादा किया था कि मैं जब आपने लड़के की शादी करूंगी तो एक धेला दहेज में नही लुंगी। सिर्फ बेटे के लिए गुणी बहु लुंगी। 
आज वही बहु बनी सासु कहती हैं कि तेरे बाप ने क्या दिया। जुठ बोलकर मेरे बेटे की किस्मत फोड़ दी। वाह री किस्मत। सृष्टि का खेल ही निराला हैं। 
क्या बताये। 
मेरी इस लेख के माध्यम से यह विनती हैं कि आज 21 सदी में लड़की मांगो दहेज नही। गुणी लड़की मांगों। ब्रांडेड वस्तुएँ तो चार दिन बाद टूट जाएगी।
मेरे इस लेख को जितना हो सके शेयर करे। सोशल मीडिया हो या व्हाट्सअप के माध्यम से ज्यादा से ज्यादा फैलाये। बाकी आपकी मर्जी। 
अगर कोई पत्रकार हैं तो इस लेख को समाचार पत्रों पत्रिकाओं व अन्य माध्यमों में प्रकाशित करवाये। 
अब हम सभी को दहेज के दबाव को खत्म करना होगा। 
बड़े लोगो के दिखावे और जुगाड़ धन से बड़े बड़े शामियाने लगाने से आर्थिक रुप से कमजोर लोगो को शर्मिंदगी आती हैं और फिर ऐसे लोग उल्टे सीधे कर्म करके अपनी इज्जत बचाने का प्रयास करते हैं और यही से शुरू होता हैं हर प्रकार के गलत कार्यो से लेकर रिश्वत और भरस्टाचार के कार्य। 
अतः सरकार ने जो दहेज निषेध का एक्ट बनाया हैं उसे पुरजोर तरीके से लागू करे। विशेष कर सरकारी सेवाओ में लगे लड़को को सरकार बांड द्वारा यह चेतावनी दे कि यदि जीवन के किसी मौड में अगर यह पता चला या कोई शिकायत आयी कि शादी में दहेज लिया या दिया तो समझो तुरंत प्रभाव से सरकारी सेवा से निष्कासित और सरकार नॉकरी से मिलने वाले जमा धन और अन्य सुविधाओं को स्थायी रूप से रोक लगा देगा। 
इस लेख को जो कोई पढ़े आगे फॉरवर्ड करे। 
धन्यवाद
मोती सिंह राठौड़
लेखक/मोटिवशन स्पीकर & लाइफ कोच
बिज़नेसमैन & समाजिक कार्यकर्ता

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