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अकेलापन

अकेला शब्द शायद आप ने हजारों बार सुना होगा। लेकिन कभी गौर किया कि अकेला शब्द में ऐसी कौनसी तासीर हैं जो बड़ा अटपटा और बेहद डरावना शब्द लगता हैं। अकेला यानी किसी का साथ नही,अकेला मतलब कोई साथ नही,अकेला मतलब सृष्टि में बिल्कुल अकेला और निरीह नितान्त अकेला। दुनिया मे जो व्यक्ति बिल्कुल अकेला होता हैं,अकेला पड़ जाता हैं। अकेला हो जाता हैं। तो समझो संसार उसको सबसे नीच,असफल,बेइज्जत व कम बुद्धि वाला काम मानते हैं। लेकिन संसार शायद भूल कर रहे हैं कि अक्सर अकेला शब्द वो शब्द हैं जो संसार को सार देता हैं। संसार मे शायद ही कोई हुआ हैं जो अकेलेपन से नही गुजरा हो। या जिसने अकेलेपन को नही जिया हो। लेकिन जिस अकेलेपन को लोग बुरा कह रहे है। अक्सर यह वो लोग कहते है जो मन और विचारों से इतने कमजोर होते हैं। जिनकी बुद्धि निम्न व इतनी कमजोर होती हैं जो बिना साथ के बिना पार्टी या माफिल के या बिना झुंड के नही रह सकते। यानी ऐसे लोग साधारण सोच और साधारण विषय की परिभाषा को इंगित करते हैं। अक्सर जिनका दिल,मन और विचार कुंठित होते है उनको अकेलापन एक जेल लगता हैं। उनको अकेलापन काटने को दौड़ता हैं। उनको अकेलापन खटकता हैं। तो समझो वो आदमी शरीरिक मेहनत या साधारण व्यक्ति विशेष हैं। क्योकि जो लोग असाधारण होते हैं विशेष और उम्दा दिमाग और कुछ गहरी और विश्व कल्याण की भावना और अनुसंधान व क्रिएटिव व लेखन की सोच व कुछ नया करने वाले लोग सदा अकेले ही रहते हैं। साधु संत और लेखक जिनकों दुनिया के लिए कुछ करना हैं वो सदा अकेले ही रहते हैं। जिनके मस्तिष्क में सदैव बेहतर और क्रिएटिव सोच आती है। वो कभी भी कुछ भी कर गुजर जाने के लिए अकेला रहना ही पसंद करते हैं। इसलिए दुनिया के सबसे बड़े शक्तिपुंज अकेले रहे,जैसे शिव सदा कैलाश में अकेले। जिसको जरूरत होगी वो वहाँ जाकर या आकर मिल लेगा या कोई नही आएगा तो अत्यंत बेहतर। क्यो साधारण लोग अकेले नही रह सकते। अकेले लोग सदा बाहरी शांति,मजे और विकास के साथ साथ हमेशा बाहर खुशी ढूंढते हैं। बाहर जाकर लोगो को हमेशा जीवन को बेहतर और पार्टी या हुजूम में जीना मतलब ऐसे लोग क्रिएटिव नही हो सकते। ऐसे लोगो सिर्फ मौज मस्ती और सिर्फ और सिर्फ अय्याशियों के लिए बने होते हैं। जिसको एक शब्द में परिभाषित कर सकते हैं वो शब्द हैं भोगी अर्थात जिन लोगो का संसार को भोगने में मजा आता हैं जिनका जन्म निम्न दर्जे का हुआ हैं जो कि सिर्फ झुंडों में चलना और झुंड में रहना जिनको पसन्द हो ऐसे लोग सिर्फ भेड़ो के झुंड की तरह साथ रहना पसंद करते हैं। जबकि शेर अकेला ही चलता हैं। रहता है। जबकि दूसरी तरफ कुदरत ऐसे लोगो को धरती पर भेजता हैं। जो जीवन मे इसी उद्देश्य को लेकर ही जन्म लेते हैं कि जिनके पास सिवाय योगी के कुछ अन्य होता ही नही। जो व्यक्ति आता ही संसार मे योग,जोग और संसार के लिए कुछ कर गुजरने के लिए। जो सदा यही सोचता हैं कि संसार मे क्या करना हैं संसार के लिए क्या देना हैं।संसार को क्या मिलना चाहिए आदि। जो अपने से ज्यादा संसार के बारे में सोचते हैं। तब ऐसे लोग फिर झुंड से या फालतू के रिस्तो नातो और अन्य तरीकों से काटने लगते है। जो बाद में सभी तरह के विषयो और भोगो को अलग रख कर सिर्फ और सिर्फ संसार के लिए कितना और क्या किया जा सकता हैं पर जोर देते हैं। तब ऐसे योगी और जोगी व साधु संत या वैरागी या विशेष आत्मा या मनीषी या क्रिएटिव या लेखक या विद्वान जिनका काम दिमाग से पड़ता हैं जिनको संसार मे भोग फालतू लगता है। जिनको संसार मे भोग एक निरिहि समय को अपने तक सीमित और सिवाय जानवर के कुछ नही लगता। जानवर सदैव झुंड में रहते है सिवाय शेर के इसमे भी एक तथ्य हैं कि वास्तविक रूप से अकेला रहा कमजोरी नही ताकत को उजागर करता है। जब भी कोई कहता हैं मुझे जरूरत नही भेड़ो के झुंड या कायर लोगो की मैं अकेला ही सबकुछ संभाल लूंगा। मैं अकेला ही सबकुछ देख लूंगा। यानी अकेला होकर व्यक्ति कमजोर नही होता बल्कि मजबूत बनता हैं। अकेलापन ही वो सबसे बेहतरीन समय हैं जब कोई भी क्रिएटिव कार्य किया जा सके। जैसे समय के साथ यदि युवा अकेलेपन को समझे और उसका उत्तम उपयोग करे तो जीवन बेहतर से बेहतर बनाया जा सकता हैं। जोकि सबसे अहम कार्य या काम हैं। जीवन मे अकेलपन को समझ कर सकारत्मक पक्ष की तरफ मुड़ गया समझो इंसान की जिंदगी का वजूद मिल गया। इंसान को एकांत स्वयं द्वारा पसन्द किया जाना चाहिए। जो एकांत स्वयं द्वारा दिल और दिमाग के साथ मन से पसन्द किया जाता हैं उसे ही वास्तविक योजना और अपने अंदर सोचने की शक्ति मिलती हैं। जबकि जिसको जबरदस्ती और दबाव और विशेष तरीको से जो उदण्ड हो जो अपने बारे में सोचता नही हो जो गैर रवैये का हो या जो अपराध को करते समय जनमानस का ख्याल नही रखता हो यानी जो आवारा होकर संसार के नियमो को तार तार कर रहा हैं। जो हत्याएं कर रहा है जो गुंडा गर्दी कर रहा हैं ऐसे लोगो को अपने अंदर देखने के लिए यानी जानवर से इंसान बनने के लिए अकेला रखा जाता है। यानी अब इसी अकेलेपन को समझो कि कैसे अकेलापन उदण्ड इंसान को भी सोचने और अपने किये गए कर्म को महसूस करे ताकि आगे से कुछ गलत नही करे। जीवन मे माँ के गर्भ में भी तो अकेलापन ही होता हैं जो विकास की मुख्य योजनाओं से गुजरता हैं। माँ के गर्भ में क्यो ईश्वर ने किसी को साथ भेजा। क्योकि एक के बाद दूसरा साथ होते ही इंसान की 50% क्रिएटिव शक्ति खत्म हो जाती हैं। साथ चाहिए भोग में विलासिता में अय्याशियों में मौज मस्ती में या जश्न व माफिल में जितना झुंड के साथ या झुंड में रहेगा समझो मौज ही मौज हैं कि रीति नीति पर चलेगा। संसार का वास्तविक सार ही मौज हैं उनके लिए जो क्रिएटिव नही हैं। लेकिन जब संसार के विकास या डेवलपमेंट की बात आएगी तो वही शब्द आएगा अकेला। अकेला आता हैं अकेला जाता हैं। यानि इस सांसर में आने और जाने का सार और साथ ही अकेला है। जीवन मे आने और संसार मे जी कर जाने का सार ही अकेलेपन का हैं। फिर क्यो संसार अकेले का मजाक उड़ाते हैं। क्योंकि जो लोग जिस विचार धारा के होते हैं उनका सोचना भी वैसा ही होता हैं। अब जब मैं यह लेख लिख रहा तब क्या मैं माफिल या झुंड में या किसी पार्टी में या किसी अय्यासी में मशगूल होकर लिख रहा हूँ तो आपका जवाब होगा नही। तो क्यो आप ऐसा क्यों सोच रहे हो। तो आपका जवाब होगा कि महफ़िल और पार्टियों में या बिना क्रिएटिव माहौल में रहे यह लेख शराब के पेग और दोस्तो की गप्प बाजी में तो नही हो सकता। अतः आज मैंने जो लेख लिखा हैं उसको अपने अंदर उतारने की कोशिश करना मैं।

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