Skip to main content

गड़रिया

 जीवन में हम कहाँ से आते है। कहाँ जाते हैं। इस विषय पर लोगो के अलग अलग मत और विचार हैं। एक धड़ा जोकि सनातन संस्कृति को मानता हैं वो दुनिया ईश्वर द्वारा चलाई जा रही हैं को पुख्ता रूप से मानता हैं। 

जबकि एक धड़ा जोकि विज्ञान को मानता हैं या विज्ञान से तालुकात रखता हैं संसार को एक रासायनिक संयोग मानता हैं। विज्ञान जोकि यह कहता हैं कि इस संसार मे कोई भगवान या ईश्वर नही होता। ईश्वर होता हैं या संसार को कोई चला रहा हैं या संसार मे कोई अलग से देवलोक हैं यह केवल एक अंधविश्वास हैं। 
लेकिन मैं जोकि सनातन संस्कृति का हिस्सा हूँ। मैं हजारो साल पुरानी संस्कृति को मानता हूँ। जबतक मैं विज्ञान के तर्क को अपने तार्किक पहलू पर खरा नही पा लूंगा तब तक मैं सनातन संस्कृति का हिस्सा बनकर ही विश्व मे जीत रहूंगा   
जीवन मे जन्म से लेकर मरण तक। माँ गर्भ में जीव के विकास और जन्म और संसार का प्रत्येक जीव गतिशील और क्रियाशील व सक्रिय अर्थात कुछ तो हैं जोकि इस संसार को गतिशील बना रहा हैं। 
सूर्य उगता हैं। चंद्रमा चमकता हैं  हवाएं चलती हैं। बदल बनते हैं निश्चिय समय पर वर्षा गर्मी,सर्दी और ऋतुओ का चक्र चलता हैं। 
पेड़ बीज से निर्माण की यात्रा करके अपने जैसे बीजो का निर्माण और वो भी बड़ी तादाद में। 
पानी ठंडा होता हैं अग्नि गर्म हवा नमी लिए हुए। कैसे पौधे बढ़ते हैं कैसे मानव से लेकर प्राणी मात्र की देह आयु,रंग रूप और आकृति अरबो में भी मिलती जुलती नही। कही कही आपस में शक्ल मिलती जुलती हैं तो यह मात्र संयोग ही होगा।
मैं अपने शरीर को जब भी आईने में देखता हूँ तो ऊपर बैठे ईश्वरीय शक्ति को मन ही मन ह्रदय से नमन करता हूँ। बाल, आंखे,नाक,कान,लहू,चमड़ी माँस से लेकर हड्डिया और नाखून और शरीर की आकृति। जनवरो से लेकर मानव या संसार के हर प्राणी के शरीर मे बदलाव और नयापन। 
कभी कभी अकस्मात मेरे मुंह से यह निकल जाता हैं कि हे ईश्वर तू कितना अनोखा और अलबेला हैं। 
तूने कैसी सृष्टि का निर्माण किया। किसी सृष्टि तुझे पसंद आई।
मैं रात को सो जाता हूँ खाता हूं शौच जाता हूँ तन से लेकर मन तक को स्वस्थ रखता हूँ सांस लेता हूँ शरीर कहा से चल रहा हैं नही। किसने डिज़ाइन किया पता नही। किसने कैसे ड्राइंग बनाई।
वाह रे कुदरत तू वास्तव में इस धरती का रचियता हैं। तो वास्तव में इस दुनिया का खेवनहार हैं तेरे बिना सब सूना हैं।
कैसे तू हमे पल  पल पाल रहा हैं संजो रहा हैं।
कैसे लताये बढ रही हैं कैसे फैसले उग रही हैं कैसे खेतो में पक्षी उड़ रहे हैं कैसे गाय रम्भा रही हैं कैसे कही मोर का शोर और कही दूर पहाड़ी के उस से चलती नदी की कलकल और पहाड़ो से गिरता झरना और पहाड़ो की चोटियों पर पड़ी बर्फ। उगते सूरज का रंग केसरिया और सफेद आसमान और हरियाली लिए धरती माता। 
मैं कितना भी लिखूंगा समझो सब कम हैं। 
वेद और पुराण दिए। ग्रह और नक्षत्र से लेकर रात के तारे और स्वछंद विचरण करते कितने अनगिनत नजारे। 
कही हिरण की फलांग हैं कही शेर की दहाड़ हैं कही पपीहे की राग हैं कही विणा की तार हैं।
मैं और पिता में तूने अपना साया बिठा दिया। छुप कर आसमान में अपना रूप भेज दिया। कोख को जन्नत बनाकर तूने मुझे जन्म दे दिया। माँ के आंचल में मीठा दूध दे दिया। मैं क्या कहु मेरे आने से पहले सबकुछ बना दिए।
कैसे मैं तेरा अहसान भूल जाऊ मैं जब तक हैं संसार की राग तेरा ही नाम जपुंगा मैं।
उबड़ खाबड़ रास्ते बना दिये। न जाने कितनों को तूने मौत की नींद में सुला दिए। तू ने बनाया और तूने मिटा दिया। जहाँ से आये थे वही वापस बुला लिया। न तो जमी पर दिखा सदियो से न तेरे संसार मे सुई भी इधर उधर हुई हिली नही। 
न तो कुछ गड़बड़ हुई तेरे बिना और न ही कोई सार बिगड़ा तेरे बिना। वहां रे सांवरिया तू हैं भी अलबेला। 
जो तेरे नाम को जापे समझो संसार का गड़रिया तू ही हैं। राधे राधे। 

Comments

Popular posts from this blog

आजका युवा और युग

  दोस्तों यह लेख मैं एक स्टडी और काफी रिसर्च के बाद लिख रहा हूँ।  विदेश की एक मैगज़ीन और वेबसाइट व संगठन ने एक स्टडी की जिसमे पाया कि पहले आर्थिक सक्षमता नही थी। ज्यादतर आबादी गरीब थी। लेकिन वर्धश्रम नही थे। बुजुर्गो की अवहेलना नही होती थी। युवा या पिछली पीढ़ी बुजुर्गो का सन्मान करती थी। जबकि आज आर्थिक सक्षमता ज्यादा हैं धरती की बड़ी आबादी आज रोजगार और धन से शारोबार हैं। हर प्रकार की सम्पनता हैं। धन और लाइफ स्टाइल भी अत्यधिक परिपक्व हैं।  नारी पढ़ लिख गयी। बच्चो को बड़े और उम्दा स्कूलों और कॉलेजो में शिक्षा भी दी। कच्चे घरो से आज ऊंचे और बड़े व लग्जरी व गाड़ी घोड़े व तमाम तरह की सुविधाएं मिल गयी लेकिन क्या आज का युग व आज के हम लोग पहले की तुलना में सुखी हैं।  क्या नारी के  शिक्षित होने और पर्दा प्रथा खत्म होने व नर के बराबर हक्क और आजादी से दुनिया सुखी हैं।  क्या बच्चो को माता पिता अपना निवाला मुँह से निकाल कर बड़े और महंगे स्कूलों और कॉलेजो में शिक्षा और अपने सपनो की कुर्बानी देकर आज बेटे बेटियों का आराम माता पिता को मिल रहा हैं।  क्या पति दिन रात मेहनत और हाल...

दहेज प्रथा

 आज की पोस्ट का शीर्षक है। दहेज प्रथा। लड़की और लड़के के जन्म से ही एक शब्द को जन्म मिल जाता हैं और वो शब्द हैं दहेज।  सदियों से इस दहेज शब्द ने कितने ही तांडव किये हैं और कही शांति के साथ परिवारों को संबल दिया।  जीवन की यात्रा में जब बच्चे बड़े होते हैं तो विरासत में मिली रीति और रिवाजो की धरोहर के मुताबिक यौवन में कदम रखती संतानों को वैवाहिक संबंधों में बांधने और संसार मे ग्रहस्थ जीवन को संबल देने के लिए विवाहो को संपादित किया जाता हैं।  सदियों से इस वैवाहिक परम्परा में दहेज अर्थात पिता अपनी पुत्री को जोकि जीवन के नए वैवाहिक क्षेत्र में कदम रखने जाती हैं तब पिता के घर से पुत्री के घर ससुराल के लिए कुछ आवश्यक वस्तुओं व नीतियों का संग्रह दिया जाता था जोकि उस समय के मुताबिक धातुओं में ही होता था।  जैसे उस समय सोना,चांदी,पीतल,तांबा, कांसा, और मिट्टी व लकड़ी के साथ साथ कपड़े आदि सहयोग वस्तुओं को देने की परंपरा थी।  इस परंपरा का कारण था कि पिता अपनी पुत्री को अपनी हैसियत के मुताबिक कुछ सहयोग और वो भी आवश्यक सामग्री और वस्तुएँ।  जीवन का सार और समय बदला। धातुओं क...

आशा अमर धन हैं।

हेलो, दोस्तो आप कैसे हैं।  मेरी तरफ से आपको आपके जीवन के लिए शुभकामना। दोस्तो,आज की पोस्ट का विषय हैं। "आशा अमर धन हैं". हम जीवन मे कई काम करते हैं। जीवन के लिए और अपनी सफलता और विकसा के लिए। नॉकरी,व्यापार,खेल।   लेकिन कभी कभी परिणाम हमारे मन मुताबिक नही आते। हम जैसा चाहते हैं। वैसा नही होता। लोग हमसे आगे निकल जाते हैं। कभी कभी हम बहुत कुछ करने के बाद भी मंजिल तक नही पहुंच पाते। कुछ तो बिना मेहनत के भी कहते मिलते हैं कि यार ऊपर वाला कितनी तकलीफ देगा। कब  ये होगा। कब वो होगा लेकिन मेहनत और मंजिल के लिए केवल मेहनत ही नही और भी बहुत कुछ होना चाहिए आपके तरकश में। जब आपके तरकश में सभी प्रकार के तीर होंगे तभी आप अपनी मंजिल तक पहुंच सकते हैं। तरकश के तिरो में मेहनत,शिक्षा,समय,त्याग,तपस्या,लक्ष्य,योजना,आशा और दृढ़ता के साथ संकल्प व शांति के साथ उचित संस्कार और क्षमा और मुस्कान। ये है आपके लिए मंजिल तक पहुचने के तीर। इन् तिरो में सबसे बड़ा और उपयोगी तीर हैं आशा का। आशा ही अमर धन हैं। किसान आशा के कारण साल दर साल काल पड़ने के बाद में अपने जीवन को जीता हैं। और कभी अपने खेतों म...