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संसार के आयाम का औसत तय।

 दोस्तो आजकी पोस्ट हैं। क्या अत्यधिक प्यार बिगड़ने की निशानी हैं। अर्थात पायदान है।

जीवन मे सदैव यह सच हजारो सालो से चला आ रहा हैं। माँ, दादी चाची नानी बुआ या बहिन,मौसी और अन्य महिला चरित्रों से हमारा समाज सुशोभित हैं। यानी यह वर्णित महिला चरित्र के अपने अलग मायने हैं।
इनके बिना घर सुना और खाली होता हैं। ऊपर वर्णित जितने भी नाम हैं वो भारतीय संस्कृति व विश्व स्तर पर पर पूजनीय माननीय व सन्मानिय रिस्ते हैं। इन रिस्तो के बिना एक व्यक्ति या परिवार रह ही नही सकता।
  किसी भी घर या समाज की धुरी इन रिस्तो से ही सम्भव हो सकता हैं। इन रिस्तो में ही प्यार बस्ता हैं। जब जब किसी व्यक्ति को इन रिस्तो के पास जाना होता हैं। तब तब व्यक्ति के रोम रोम में एक अजीब सी ख़ुसी दौड़ती हैं। यानी रिस्तो में सिवाय प्यार के कुछ नही मिलता। 
वही पिता,बड़ा या छोटा भाई दादा,चाचा नाना फूफा मौसा से लेकर अन्य रिस्ते स्वभाव से कठोर और नियम पसन्द होते हैं। कही कही इन रिस्तो में कोमलता और प्यार होता हैं। 
लेकिन मुख्यता नर रिस्तो में कठोरता अत्यधिक होती हैं। इन रिस्तो के नियमो और संसार के कठोर सिधान्तो का पुट होता हैं। 
यानी प्रकृति में इन दो रिस्तो के कारण जीवन चक्र को गति मिलती हैं। इन रिस्तो में थोड़ा बहुत ही अनुपात बदला जीवन चक्र में प्यार और कठोरता का अनुपात बदल जाता हैं।
यानी केवल प्यार भी उत्तम निर्माण में बाधक हैं। केवल कठोरता भी उत्तम निर्माण में बाधक हैं। कारण सिर्फ एक ही हैं की जीवन मे दो रस काम करते हैं प्यार और कठोरता।
प्यार जहाँ आंतरिक शांति और खुशी को परिभाषित करता हैं। वही कठोरता व्यक्ति के अंदर रोष और नफरत पैदा करती हैं। 
अब आते हैं। मुख्य विषय की तरफ की प्यार और कठोरता जीवन मे नकरात्मक और सकारत्मक जीवन शैली के लिए मुख्य क्यो हैं। 
जीवन मे अति सर्वत्र वर्जते अर्थात जीवन मे ज्यादा प्यार हो या ज्यादा खुशी दोनों नुकशान दायक हैं। 
अक्सर ज्यादा प्यार देने से व्यक्ति में बिगड़ने लापरवाह होने या कर्म से भटक कर अय्यासी की तरफ मुड़ने के चांस ज्यादा होते है। राजा महाराजाओ से लेकर आज की अमीरी में माता पिता अपने बच्चो के लिए दूसरों को धोखा देकर उल्टा सीधा करके इतना धन और व्यवस्था बनाने की होड़ में लग जाते हैं कि माँ अक्सर कहती हैं कि बच्चो के लिए इतनी व्यवस्था कर दो की बच्चे तकलीफ नही पाये। जिंदगी की हर खुशी पिता खरीद लेता हैं लेकिन वही माता पिता का प्यार और व्यवस्थाएं माता पिता के लिए एक दिन नासूर बन जाती हैं।
कारण अत्यधिक प्यार। जरूरत से ज्यादा प्यार और जरूरत से ज्यादा किया गया प्यात का पोषण एक दिन बिगड़ने का कारण बन जाता हैं।
आज भी शहरों में हो या ग्रामीण परिवेश में उन घरों के बच्चे ज्यादा बिगड़े जिनके घरों में अताह सम्पति और सुख सुविधाओं के सम्पूर्ण साधन और धन से लेकर जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सबकुछ मिला लेकिन वही बच्चे वंश और परिवार के लिए नासूर बन गए।
संसार मे नारी रिस्ते जितने भी हैं उनका प्यार का औसत यदि 40% से ऊपर गया तो समझो बच्चों के चरित्र और जीवन के सक्षम रास्तो के निर्माण के बच्चें बिगड़ने की तरफ बढ़ जायेगा।
यानी किसी भी घर मे 100% नियम और कायदे यदि बांटे जाए तो नर के कायदों को 60% और नारी के कायदों को 40% तक का अनुपात में रखना जरूरी हैं। 
अब जिस घर मे लड़के को पिता और लड़की को माता यदि शिक्षा से लेकर सांसारिक रीति नियम और कायदों से निर्माण में मुख्य भूमिका रखते हैं तो समझो उस घर और सांसर में जीवन चक्र सुचारू और सहर्ष संघर्ष में जीवन को एक विशेष आकर और अयाम मिलेगा। 
यदि इस अनुपात में कही भी कुछ गड़बड़ हुई समझो अनुपातिक सांसारिक जीवन चक्र में पूर्ण बदलाव आएगा। जोकि संसार या घर के विघटन और पतन का पूर्ण कारण बनेगा।
जीवन मे माता का 40% से यदि बच्चो को प्यार करने का अनुपात यदि 60% तक पहुँच गया समझो उस घर मे बच्चे नही शैतान विकसित होंगे। क्योकी जीवन प्यार से नही कठोरता से चलता हैं। 
कठोरता अनुशासन को जन्म देती हैं। अनुशासन संसार के समस्त नियमो और कायदों को व्यवस्थित रखने में  मुख्य भूमिका अदा करती करती हैं। 
जीवन चक्र का कायदा यदि सही रीति और नियमो से बनाये रखना हैं तो प्यार और कठोरता के अनुपात को 40% :60% तक बनाये रखना अति आवश्यक हैं। जोकि संसार के चक्र को परिभाषित करता हैं।
संसार मे सदैव नियम अनुपात आवश्यक हैं। शिक्षा में भी यदि किसी छात्र के 33% से कम अंक आते हैं तो समझो उस बालक या बालिका का जीवन साधारण से निम्न ही होगा|.
जीवन के चक्र में अनुपातिक योग ही जीवन को चलाने के लिए मुख्य पायदान हैं।
अक्सर हम नारी वर्ग को बच्चों को ज्यादा प्यार और दुलार देते देखते है जोकि शायद कही न कही बिगड़ने की तरफ एक इशारा है कि उस घर मे बिगड़ने के संसाधनो का निर्माण होना संभव हैं। जोकि संसार के जीवन चक्र में सही नही हैं।
जैसे संसार मे ऋतुओ का चक्र निर्मित हैं जिसका तय आयाम हैं जब जब कभी यह आयाम बिगड़ता हैं किसी एक ऋतु को औसत से ज्यादा आकर मिलता हैं समझो जीवन चक्र में बदलाव होना और संसार मे भयँकर विघटन होना तय हैं। 
परिवार को यदि सक्षम और उचित दिशा की तरफ मौड़ना हैं तो उसके लिए तय औसत आयाम को तव्वजो देना आवश्यक हैं। यही संसार के नियम में तय हैं।

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