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kyo nahi hota || क्यों नहीं होता

     क्यों नहीं होता || क्यों नहीं मिलता

आज इस विषय पर लिखूंगा. अक्सर लोग कुछ न कुछ कहते हैं जब उनका कोई काम नहीं होता या बिगड़ जाता हैं. हम सभी कहते हैं "क्यों नहीं होता " "क्यों नहीं हुआ ". अक्सर हम दुखी हो जाते हैं. क्या आपको पता हैं की दुनिया में सबसे बड़ा धोखा क्या हैं और कौन किसीको देता हैं.
दोस्तों इन प्रश्नो का एक ही उत्तर हैं की इस दुनिया में अगर कोई सबसे बड़ा दुश्मन अगर हमारा हैं और सबसे बड़ा धोखा क्या हैं तो इसका एक ही उत्तर हैं और वो उत्तर हैं "हम स्वयं".
इस दुनिया में हम से बड़ा न तो कोई दुश्मन हैं और न ही कोई धोखेबाज। जोकुछ हम भुगत रहे हैं उसका जवाब हम ही हैं. अगर आप अच्छा कर रहे हैं तो भी आप ही अच्छा कर रहे हैं और बुरा हो रहा हैं वो भी हम स्वयं से हो रहा हैं. कितनी बड़ी विडंबना हैं की नींद से तो फुर्सत नहीं और चले हैं हुसैन बोल्ट और सचिन बनने। पहले अपने आपको बहानो से बहार निकालो अपने आपको आईने  सामने खड़ा करके स्वयं से सवाल करो की क्या तुम 100% सही दिशा में  समय के साथ अपने सुचारु लक्ष्य की तरफ बढ़ रहे हो.
सिर्फ और सिर्फ दुनिया को दोष देते हैं की फला आदमी ने मुझे धोखा दिया या उसके कारण मैं पीछे रह गया हूँ. लेकिन कभी किसी भी बुरे काम का श्रय अपने ऊपर नहीं लेता। कारन अहम और अपनी अकड़. क्यों हम ऐसा करते हैं उसका कारण हैं जूठा भ्र्म और अपने आप को श्रेष्ठ मानना।



अब बात करते हैं मुख्य विषय की "क्यों नहीं होता" "क्यों नहीं हुआ" तो उसका कारण हैं की जब बबुल का पेड़ लगोगे तो आम कहा से मिलेंगे। जब प्रयाप्त समय अगर किसी काम को नहीं दोगे तो उस काम का फल सकारात्मक कैसे आएगा, अक्सर हम छात्रों को कहते सुनते हैं की फला लड़के के तो 90% नंबर ए जबकि मेरे तो 55% नंबर आये हैं. तो उसका जवाब हैं की तुमने अपना समय पढ़ाई में कम और दूसरी जगह फालतू मटरगस्ती में ज्यादा दिया। जबकि जिसको अच्छे नंबर मिले हैं उसे मटरगस्ती में अपना समय खराब नहीं किया इस लिए आज उसको ज्यादा नंबर मिले।
इस दुनिया में प्रकृति का नियम बड़ा सटीक हैं जो दोगे जितना दोगे उतना और उससे कही ज्यादा ही मिलेगा। जिसका सीधा उद्धहरण हैं वर्षा। गर्मी में जितना पानी आसमान में भाप बनकर उडाता हैं वर्षा उससे कई गुना ज्यादा बनाकर धरती पर बरसाती हैं. अतः इससे ही हमे समझ जाना हैं की क्या मिलता हैं और क्यों मिलता हैं. 
कुदरत वही लौटाती हैं जो हम कुदरत को देते हैं. प्रत्येक कार्य की कीमत तय हैं. कुदरत  के पास सबकुछ तय किया हुआ हैं. अब छात्रों को पढ़ना हैं, ग्रहणी को घर का काम करना हैं लेकिन अगर दोनों गप्पो में अपना समय ख़राब करेंगे तो न छात्र को शिक्षा और न ग्रहणी को घर के कार्यो में सफलता मिलेगी।
अतः हमारे जीवन में जोकुछ भी घट रहा हैं या हो रहा हैं उसका कारण हम स्वयं ही हैं. कभी कभी लक्ष्य बड़े और अन्य लोगो से अलग हैं या लक्ष्य अत्यधिक बड़े तय कर लिए व् संसाधनों की कमी या मानवशक्ति की कमी के कारण छोटे लक्ष्य वाले जल्दी सफल हो जाते हैं और बड़े लक्ष्य वालो को समय लगता हैं।
इसकी सोच आपके पास होनी चाहिए।

एक बड़ा और आलीशान बांग्ला बनने में और एक कमरा बनने  समय अलग अलग लगेगा। इसका ध्यान लक्ष्य तय करते समय ही होना चाहिए। अगर धैर्य नहीं हैं उतावलापन हैं और हथेली में आम उगाना हैं तो यह हमारी भूल हैं जिसका जवाब हमारे स्वयं के पास "  क्यों नहीं होता" या " क्यों नहीं मिलता"

लेखक
 मोती सिंह राठौड़  

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