हेलो,दोस्तो आप कैसे हैं।
आपका हर दिन खुशी से बीते।
यह मेरी ब्लॉगर पर पहली पोस्ट हैं।
आज की पोस्ट का विषय है। जिसको आपने ऊपर पढ़ा होगा। फिर भी मैं बता देता हूँ "लोग क्या कहेंगे।
आज मैं आपको इस विषय पर मेरा अनुभव और इसकी गहराई के बारे में लिखूंगा।
दोस्तो,
सबसे पहले मैं आपको बता दु की मेरी किसी भी पोस्ट का जो मतलब हैं वो किसी परंपरा या संस्कृति के खिलाफ नही हैं।
दोस्तो, अब मैं आता हूँ। आने मूल विषय पर। अक्सर आप और मैं यह कहते सुनते हैं। कि यार लोग क्या कहेंगे। लोग मेरे बारे में क्या बाते करेंगे। अगर नही हुआ तो। मै लोगो को क्या जवाब दूंगा।
दोस्तो अक्सर इसी उधेड़बुन में हजारो लाखो काबिल लोग अपने सपने अधूरे छोड़कर सिर्फ लोगो को खुश करने में लग जाते हैं। जबकि लोग कभी भी आपसे खुश नही होते। लोग सिर्फ दो ही बातें चाहते हैं। पहली ये बन्दा हमसे आगे नही बढ़ना चाहिए किसी भी हालत में। दूसरा गिरने के बाद हेकड़ी मारना की हमने कहा था न कि ये बन्दा कभी ये काम नही कर सकता।
लोग सिर्फ किसी को अपने आगे गिरता देखना चाहते हैं। या फिर आप उनके झुंड में शामिल हो जाओ। ताकि उनको ये विस्वास हो जाये कि अब इसके आगे बढ़ने के दिन गए।
दोस्तो, किसी ने सच ही कहा हैं। कि जब लोगो ने भगवान शंकर को नही छोड़ा तो आप और हम क्या हैं।
मैं आपको इसकी एक कहानी सुनाता हूं। शायद हो सकता की अपने यह कहानी सुन रखी होगी लेकिन शब्द अलग और अन्य तरीके से कहे गए हो सकते हैं।
कहानी
एक बार भगवान शंकर माँ पार्वती और नंदी कही जा रहे थे। तीनो बड़ी मस्ती से चल रहे थे। जब वो एक गांव से गुजरे तभी किसी ने कहा देखो कितने मूर्ख हैं। नंदी पास हैं। और पैदल चल रहे हैं।
नंदी ने कहा भगवान आप और माता मेरी पीठ पर बैठ जाइए। मैं जल्दी ही अपने गंतव्य तक पहुंच जाऊंगा। शंकर और माँ पार्वती जब दोनों नंदी की पीठ पर सवार हुए और चल पड़े। जैसे ही वो एक गांव से निकले। किसी ने कहा देखो मूर्ख दोनो एक जानवर की पीठ पर बैठे हैं।
शंकर ने सुनसान में नंदी को रोक कर पार्वती को नंदी पर बिठा दिया। और चल पड़े। जैसे ही एक गांव से निकले किसी ने कहा। देखो कैसी पत्नी हैं। पति पैदल चल रहा हैं। और पत्नी आराम से नंदी की पीठ पर बैठी जा रही हैं। पार्वती ने सुनसान में नंदी को रोक कर शंकर को बैठा दिया।
अब् फिर चल पड़े। लेकिन जैसे ही अन्य गांव से निकले। किसी ने कहा कैसे लोग हैं। आदमी आदमी आराम से बैठ हैं। और पशु और औरत पैदल चल रहे हैं।
अब शंकर ने कहा। कि चलो दोनो बैठ जाते हैं। और दोनों नंदी की पीठ पर बैठ गए। लेकिन जैसे ही दूसरे गांव से निकले। देखो कैसा कलयुग आया हैं। दोनो एक बेचारे जानवर पर बैठे हैं।
अबकी बार शंकर और पार्वती ने नंदी को उठा लिया और चल पड़े। थोड़ी ही दूर गए कि किसी अन्य गांव वाले ने कहा कैसे पागल हैं। इनको नंदी पर होना चाहिए था लेकिन कैसे मूर्ख हैं।
अबकी शंकर समझ चुके थे कि लोगो के कहने से चलोगे तो जीवनभर कभी सही दिशा और दशा तय नही कर पाओगे। इसलिए वही करो जो आपका दिल चाहता हैं। लेकिन सिर्फ इन बातो को दिल और दिमाग से आंकलन करने के बाद।
1. कोई भी कार्य प्रकर्ति के खिलाफ नही होना चाहिए।
2. हम या आप जो भी कार्य करना चाहते हैं। उसमें हमारे साथ साथ मानवता का भला होना चाहिए। हमारे जाने के बाद। उसका उपयोग ये जग कर सके।
3. इस जग में अपने लिए नही दुसरो के लिए जिये। जैसे पेड़ फल नही खाता। अंधी और तूफान के थपेड़े खाता हैं। और हमे फल और फूल देता हैं। समुद्र या नदिया पानी नही पीती लेकिन हमारे लिए हजारो किलोमीटर का सफर बिना रुके तय करती हैं। धरती की तरह शांत और सहनशक्ति।
दोस्तो ये बिंदु ध्यान में रख कर सदैव अपने दिल कि सुने और चल पड़े अपनी मंजिल की और जैसे शंकर,पार्वती और नंदी लोगो को नजर अंदाज करके चल पड़े थे।
आपको मेरी पोस्ट कैसे लगी कमेंट बॉक्स में जरूर लिखे
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आज की पोस्ट का विषय है। जिसको आपने ऊपर पढ़ा होगा। फिर भी मैं बता देता हूँ "लोग क्या कहेंगे।
आज मैं आपको इस विषय पर मेरा अनुभव और इसकी गहराई के बारे में लिखूंगा।
दोस्तो,
सबसे पहले मैं आपको बता दु की मेरी किसी भी पोस्ट का जो मतलब हैं वो किसी परंपरा या संस्कृति के खिलाफ नही हैं।
दोस्तो, अब मैं आता हूँ। आने मूल विषय पर। अक्सर आप और मैं यह कहते सुनते हैं। कि यार लोग क्या कहेंगे। लोग मेरे बारे में क्या बाते करेंगे। अगर नही हुआ तो। मै लोगो को क्या जवाब दूंगा।
दोस्तो अक्सर इसी उधेड़बुन में हजारो लाखो काबिल लोग अपने सपने अधूरे छोड़कर सिर्फ लोगो को खुश करने में लग जाते हैं। जबकि लोग कभी भी आपसे खुश नही होते। लोग सिर्फ दो ही बातें चाहते हैं। पहली ये बन्दा हमसे आगे नही बढ़ना चाहिए किसी भी हालत में। दूसरा गिरने के बाद हेकड़ी मारना की हमने कहा था न कि ये बन्दा कभी ये काम नही कर सकता।
लोग सिर्फ किसी को अपने आगे गिरता देखना चाहते हैं। या फिर आप उनके झुंड में शामिल हो जाओ। ताकि उनको ये विस्वास हो जाये कि अब इसके आगे बढ़ने के दिन गए।
दोस्तो, किसी ने सच ही कहा हैं। कि जब लोगो ने भगवान शंकर को नही छोड़ा तो आप और हम क्या हैं।
मैं आपको इसकी एक कहानी सुनाता हूं। शायद हो सकता की अपने यह कहानी सुन रखी होगी लेकिन शब्द अलग और अन्य तरीके से कहे गए हो सकते हैं।
कहानी
एक बार भगवान शंकर माँ पार्वती और नंदी कही जा रहे थे। तीनो बड़ी मस्ती से चल रहे थे। जब वो एक गांव से गुजरे तभी किसी ने कहा देखो कितने मूर्ख हैं। नंदी पास हैं। और पैदल चल रहे हैं।
नंदी ने कहा भगवान आप और माता मेरी पीठ पर बैठ जाइए। मैं जल्दी ही अपने गंतव्य तक पहुंच जाऊंगा। शंकर और माँ पार्वती जब दोनों नंदी की पीठ पर सवार हुए और चल पड़े। जैसे ही वो एक गांव से निकले। किसी ने कहा देखो मूर्ख दोनो एक जानवर की पीठ पर बैठे हैं।
शंकर ने सुनसान में नंदी को रोक कर पार्वती को नंदी पर बिठा दिया। और चल पड़े। जैसे ही एक गांव से निकले किसी ने कहा। देखो कैसी पत्नी हैं। पति पैदल चल रहा हैं। और पत्नी आराम से नंदी की पीठ पर बैठी जा रही हैं। पार्वती ने सुनसान में नंदी को रोक कर शंकर को बैठा दिया।
अब् फिर चल पड़े। लेकिन जैसे ही अन्य गांव से निकले। किसी ने कहा कैसे लोग हैं। आदमी आदमी आराम से बैठ हैं। और पशु और औरत पैदल चल रहे हैं।
अब शंकर ने कहा। कि चलो दोनो बैठ जाते हैं। और दोनों नंदी की पीठ पर बैठ गए। लेकिन जैसे ही दूसरे गांव से निकले। देखो कैसा कलयुग आया हैं। दोनो एक बेचारे जानवर पर बैठे हैं।
अबकी बार शंकर और पार्वती ने नंदी को उठा लिया और चल पड़े। थोड़ी ही दूर गए कि किसी अन्य गांव वाले ने कहा कैसे पागल हैं। इनको नंदी पर होना चाहिए था लेकिन कैसे मूर्ख हैं।
अबकी शंकर समझ चुके थे कि लोगो के कहने से चलोगे तो जीवनभर कभी सही दिशा और दशा तय नही कर पाओगे। इसलिए वही करो जो आपका दिल चाहता हैं। लेकिन सिर्फ इन बातो को दिल और दिमाग से आंकलन करने के बाद।
1. कोई भी कार्य प्रकर्ति के खिलाफ नही होना चाहिए।
2. हम या आप जो भी कार्य करना चाहते हैं। उसमें हमारे साथ साथ मानवता का भला होना चाहिए। हमारे जाने के बाद। उसका उपयोग ये जग कर सके।
3. इस जग में अपने लिए नही दुसरो के लिए जिये। जैसे पेड़ फल नही खाता। अंधी और तूफान के थपेड़े खाता हैं। और हमे फल और फूल देता हैं। समुद्र या नदिया पानी नही पीती लेकिन हमारे लिए हजारो किलोमीटर का सफर बिना रुके तय करती हैं। धरती की तरह शांत और सहनशक्ति।
दोस्तो ये बिंदु ध्यान में रख कर सदैव अपने दिल कि सुने और चल पड़े अपनी मंजिल की और जैसे शंकर,पार्वती और नंदी लोगो को नजर अंदाज करके चल पड़े थे।
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